शनिवार, 12 नवंबर 2011

अनेकांतवाद :

अनेकांतवाद :

इस जगत में अनेक वस्तुएँ हैं और उनके अनेक धर्म (गुण-तत्व) हैं। जैन दर्शन मानता है कि मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, पेड़ और पौधों में ही चेतना या जीव नहीं होते बल्कि धातुओं और पत्थरों जैसे दृश्यमान-जड़ पदार्थ  भी जीव सकन्ध समान होता हैं। पुदगलाणु भी अनेक और अनंत हैं जिनके संघात बनते-बिगड़ते रहते हैं।अनेकांतवाद कहता है कि वस्तु के अनेक गुण-धर्म होते हैं। वस्तु  की पर्याएं बदलती रहती है। इसका मतलब कि पदार्थ उत्पन्न और विनष्ट होता रहता है, परिवर्तनशील, आकस्मिक और अनित्य है। अत: पदार्थ या द्रव्य का लक्षण है बनना, बिगड़ना और फिर बन जाना। यही अनेकांतवाद का सार है।इसे इस तरह में समझें कि हर वस्तु को मुख्य और गौण, दो भागों में बाँटें तो एक दृष्टि से एक चीज सत्‌ मानी जा सकती है, दूसरी दृष्टि से असत्‌। अनेकांत में समस्त विरोधों का समन्वय हो जाता है। अत: सत्य को अनेक दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।

1 टिप्पणी:

  1. अभिव्यक्ति तो जड़ चेतन दोनो में छुपी होती है। महसूस करने वाला चाहिए।

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